धूप-छाँव सी ज़िंदगी, जो जीवन का किस्सा बन जाए,
जो जीवन का फ़लसफ़ा समझाए, वक़्त की आँधी में भी सच्ची राह दिखाए।
कभी गमगीन, कभी हँसती-खिलखिलाती यूँ ही गुज़र जाए,
सच्चे रिश्तों की अहमियत समझाए, गिरकर भी गिरने का एहसास न कराए।
चाशनी सी मन में घुल जाए, रंगों से हर पल सज जाए,
सूरज की तपिश में भी जैसे, चाँदनी-सी ठंडक भर जाए।
काँटों पर चलकर भी जो चुभन का एहसास न कराए,
श्वेत-सी निर्मल होकर, पतझड़ के बाद नई कली बन जाए।
ज़िंदगी जब ज़िंदगी को समझे, ऐसा कोई मुकाम आए,
न तेरी, न मेरी — बस “ज़िंदगी” ही कहलाए।
Anupama Arya
